Saturday, 11 July 2020

सुन ले जरा...

बोलएंगे कम, और 
लिखेंगे ज्यादा।
किया था कभी 
अपने आप से यह वादा।

बोलने और लिखने में 
अब नहीं रहा हैं अंतर
जैसे के हुआ हैं परिवर्तन 
मन के भीतर।

जो बात जुबा पे नहीं ला पाते,
वो स्याही मैं मिलाते हैं।
स्याही ख़त्म होजाये तो,
 दिल की खामोशी मैं सराहते हैं। 

बोलने और लिखने में  
इतने उलझ गए हैं हम,
पता न चला की सुनने से ही 
उभर आएंगे उनके सारे गम।

खामोश दिल को बस सँभालते हैं 
और समझाते हैं अभी।
युही ना बन खुदगर्ज, थम जा, 
सुन ले धड़कन उनकी भी कभी।