Saturday, 11 July 2020

सुन ले जरा...

बोलएंगे कम, और 
लिखेंगे ज्यादा।
किया था कभी 
अपने आप से यह वादा।

बोलने और लिखने में 
अब नहीं रहा हैं अंतर
जैसे के हुआ हैं परिवर्तन 
मन के भीतर।

जो बात जुबा पे नहीं ला पाते,
वो स्याही मैं मिलाते हैं।
स्याही ख़त्म होजाये तो,
 दिल की खामोशी मैं सराहते हैं। 

बोलने और लिखने में  
इतने उलझ गए हैं हम,
पता न चला की सुनने से ही 
उभर आएंगे उनके सारे गम।

खामोश दिल को बस सँभालते हैं 
और समझाते हैं अभी।
युही ना बन खुदगर्ज, थम जा, 
सुन ले धड़कन उनकी भी कभी।

Friday, 15 May 2020

यादें...

आज फिर एक धून याद आयी
और चुपके से हमे ले गई
दुबारा उन्ही मेहेक्ति गलियाँ
जहा कभी खिलती थी जूही की मासूम कालियाँ।

वो महक तो अभी भी है ताजा
लेकिन, न जाने क्यों वो धून बन गई हैं सजा
जिस किसे हम उसे सुनाते
ताने तो उनके जरूर बनते।

इसलिए दोस्तों हमें यकीन करलो
यादो को अपने दिल में ही कैद कर रखलो
आजाद करना चाहो तो कर देना उन्हें उन्हीं के हवाले।

Saturday, 28 March 2020

एक पहेली..

जाने किस मोड़ पे हैं जिंदगी?
लोग शायद हमे पहचान न पाए।

या फिर हम ही अपनी पहचान
बना नहीं पाए।