Friday, 15 May 2020

यादें...

आज फिर एक धून याद आयी
और चुपके से हमे ले गई
दुबारा उन्ही मेहेक्ति गलियाँ
जहा कभी खिलती थी जूही की मासूम कालियाँ।

वो महक तो अभी भी है ताजा
लेकिन, न जाने क्यों वो धून बन गई हैं सजा
जिस किसे हम उसे सुनाते
ताने तो उनके जरूर बनते।

इसलिए दोस्तों हमें यकीन करलो
यादो को अपने दिल में ही कैद कर रखलो
आजाद करना चाहो तो कर देना उन्हें उन्हीं के हवाले।